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Tuesday, December 10, 2019
अक्स
ना परी ना हूर जैसी
ना शायर की गजल जैसी
ना सूरज का तेज ना चांदनी जैसी
ना सरगम के सुर जैसी
थोड़ी अलबेली थोड़ी पहेली
थोड़ी सी अलग खुद की सहेली
मुश्किलों को पार करती अकेली
क्या कहूं किसके जैसी
मैं बस मेरी जैसी।
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