Friday, April 10, 2020

अधूरा साथ

है साथ चलते मगर  हम सफर नहीं
बाहों में जिस्म  मेरा पर ख्वाबों में हम नहीं
है साथ साथ पर फासले भी कम नहीं
लबों पे मेरे उस के  ही तराने
पर उसके लबों पर मेरी जुंबिश तक नहीं
वह मेरे हर पल में आज में  कल में
हम आज  में भी नहीं
रूह  तक समा गया है जो
हम उसकी बातों में भी नहीं
रातें गुजरती याद में जिसकी
सोता वो  चैन से बाहों में कहीं
कहता था मुझसे ना तुझसे  पहले ना तेरे बाद कोई
गुम हो गया है आज वो पुरानी गलियों में कहीं
हर सितम के बाद कहता है मासूमियत से
तेरे गुनहगार हम नहीं।

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