Monday, April 27, 2020

अर्पण

शब्दों के मोती से
मन का खजाना खोलती हूं
तेरी रचना तुझको सौंपती हूं
सांसों के हर धागे से
प्रीत की चादर बुनती हूं
मोल नहीं जिसका कोई
बेमोल अर्पित करती हूं
पलकों के चिलमन में
तेरी यादें बसा के रखती हूं
तू आए या ना आए
रोज तेरा रास्ता निहारती हूं
रोकती  हूं मचलते कदमों को
ना हो तू रुसवा कहीं जमाने में
हर रोज मर के जीती हूं
मिल जाए शायद मन से मन कभी
इस आस में हर सांस संभाले रहती हूं
मिल जाए दिल को सुकून जरा
हर वक्त तेरी तस्वीर सीने से लगाए रखती हूं।


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