Thursday, March 4, 2021

सूखे पत्ते

 बिखरे है जमी पर कुछ सूखे पत्ते

जो थे अभी कुछ सूखे कुछ मटमैले

जिन्हें देख कहते थे कभी 

नई कोपले आई

गिरते है आज वही पेड़ो से 

बन पतझड़ की गवाही

खेला था जिनकी छांव में कभी बचपन

छीन रही छांव सूखे पत्ते बन

जो देते थे कभी 

इतिहास की गवाही

बिखरे पड़े हैं आज 

सुनता न कोई दुहाई

सहेज लो हर सूखे पत्ते

जुड़ी है जिंदगी जिनसे

पेड़ो से टूट गए जो पतझड़ में

हो जायेंगे हरे वसंत में

मुरझा गए जो जीवन में 

ना खिलेंगे फिर कभी किसी मौसम में

समेट लो हर सुखा पत्ता

क्यों की सूखे पत्तों से ही इतिहास बनता।

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