Monday, January 20, 2025

कमी

 रह गई थी कमी शायद कोई

 जो चाहा पा न सके

न तुम समझे न हम समझा सके।


न पा सके न भूला सके 

मूंद ली  आँखें मगर

ख्वाबों से  जुदा  न कर सके।


मिली बेरुखी हर बार मगर

एक बार प्यार न जता सके।


लुटाई थी दिल की दौलत जहां 

मेरे ग़म में एक आंसू न बहा सके।


दौड़ जाती थी  एक आवाज पर

आवाज दी जब उन्हें एक कदम न उठा सके।


हर पल दी खुशियां जिसे

एक मुस्कान भी न दे सके।


समझा था मैने ही गलत उसे

शिकवा नहीं कोई जो न समझा मुझे।

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