शाम की दहलीज़ पर ठहरा है एक सवाल,
वक़्त की गर्द में गुम है मेरा ही ख़याल।
अधूरी हसरतों का बोझ उठाए फिरती हूँ,
सुकून की तलाश में गुज़रा है हर साल।
मझधार में सिमटी हैं कई अनकही बातें,
पछतावे की धूप है या उम्मीदों की रातें।
बिखरे हुए अक्स को फिर से समेट लूँ,
पर इस टूटे हुए आईने का क़ातिल है कौन।
थक कर ठहरी है लहर, किनारे की तलाश में,
एक उम्र गुज़ारी है बस, इसी आस में।
मंज़िल की ज़ुस्तज़ू में सफ़र तो कट गया,
अब ये न पूछना कि मेरा हासिल है कौन।
जिंदगी का हासिल कुछ नहीं होता। राह भी मंजिल है। राहों में अच्छे साथी, खूबसूरत रास्ते हंसते गाते कट जाए बस यही है जिंदगी!!
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