Tuesday, August 4, 2026

उम्मीद का चिराग़

 

ग़म की धूप में भी जिसने मुस्कुराना सीख लिया,

ज़िम्मेदारियों के बोझ में भी कदम बढ़ाना सीख लिया।

​पिता का साया उठा, फिर माँ पर भी आई आँच,

हर दर्द को सीने में उसने छुपाना सीख लिया।

​बचपन की गरीबी थी, फिर खुशियों पर ग्रहण लगा,

टूटे सपनों से भी नया आशियाना बनाना सीख लिया।

​खो गई बेफ़िक्री, छूट गया वो फोटोग्राफी का शगल,

उसने हर मोड़ पर हालात से टकराना सीख लिया।

​छीन ली ज़माने ने उसकी मासूमियत, वो हँसी,

पर उम्मीद के धागे से ख़ुद को पिरोना सीख लिया।

​नाज़ुक हाथों में कलम है, दिल में है बुलंद हौसला,

उसने हर स्याही से अपना मुक़द्दर सजाना सीख लिया।

​यकीन है उसे, बदलेगी ये फ़िज़ा, बीतेगी ये रात,

अंधेरों की राहों में उसने चिराग़ जलाना सीख लिया।

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