Sunday, January 3, 2021

खामोश अल्फाज

 चुप है शब्द मेरे खामोश से अल्फाज है

टूटा है कुछ मगर आती नहीं आवाज है

बजती थी जिनमें प्यार की धुन कभी चुप से वो साज है

न सोचा था जैसा कभी वह आज है

चाहा था न पाना जिसे कभी उसके खोने का एहसास है

वीरान से आंखों में बस इंतजार है

सपने ही सपने थे जिनमें कभी अब नमी का जहान है

मिल पाएगा मन से मन कभी बस यह सवाल है।
























1 comment: