चुप है शब्द मेरे खामोश से अल्फाज है
टूटा है कुछ मगर आती नहीं आवाज है
बजती थी जिनमें प्यार की धुन कभी चुप से वो साज है
न सोचा था जैसा कभी वह आज है
चाहा था न पाना जिसे कभी उसके खोने का एहसास है
वीरान से आंखों में बस इंतजार है
सपने ही सपने थे जिनमें कभी अब नमी का जहान है
मिल पाएगा मन से मन कभी बस यह सवाल है।
Alfaj na bol kar bhi sab bolten h
ReplyDeleteNice written