Tuesday, January 11, 2022

उलझन

 देख कर उसको देखा ना खुद को कभी

जान कर उसको कुछ जानने की चाहत नही

उसको देखू उसको चाहूं

भुलाए भी भूल ना पाऊं

जहां भी जाती हूं

बस उसे ही पाती हूं

खुली आंखों तक तो ठीक था 

बंद आंखो में भी उसे ही पाती हु

लिखती हु उसे उसे ही गुनगुनाती हूं

खोई हूं उसके खयालों में ऐसे

बन रहा वो अंजान, नादान हो जैसे

जान के जो हो अंजान हों जैसे

हाल ए दिल बताऊं उसे कैसे?

उलझन ये सुलझाऊ कैसे?

समझ नही पाती हूं।

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