देख कर उसको देखा ना खुद को कभी
जान कर उसको कुछ जानने की चाहत नही
उसको देखू उसको चाहूं
भुलाए भी भूल ना पाऊं
जहां भी जाती हूं
बस उसे ही पाती हूं
खुली आंखों तक तो ठीक था
बंद आंखो में भी उसे ही पाती हु
लिखती हु उसे उसे ही गुनगुनाती हूं
खोई हूं उसके खयालों में ऐसे
बन रहा वो अंजान, नादान हो जैसे
जान के जो हो अंजान हों जैसे
हाल ए दिल बताऊं उसे कैसे?
उलझन ये सुलझाऊ कैसे?
समझ नही पाती हूं।
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