रह गई थी कमी शायद कोई
जो चाहा पा न सके
न तुम समझे न हम समझा सके।
न पा सके न भूला सके
मूंद ली आँखें मगर
ख्वाबों से जुदा न कर सके।
मिली बेरुखी हर बार मगर
एक बार प्यार न जता सके।
लुटाई थी दिल की दौलत जहां
मेरे ग़म में एक आंसू न बहा सके।
दौड़ जाती थी एक आवाज पर
आवाज दी जब उन्हें एक कदम न उठा सके।
हर पल दी खुशियां जिसे
एक मुस्कान भी न दे सके।
समझा था मैने ही गलत उसे
शिकवा नहीं कोई जो न समझा मुझे।