Friday, December 3, 2021

मालूम नहीं

 हो रही है उनकी आदत या है ये मुहब्बत, मालूम नहीं ।

क्यों आँखों को है रात  रात भर जगने की लत, मालूम नहीं। 


मिलेगा नहीं  उधर से कोई जवाब ये भी पता  है  मुझको

फिर भी क्यों मैं  इंतजार करती हूँ अविरत, मालूम नहीं। 


बसा लिया आंखो में जिनको वो मुड़कर भी नहीं देखते,

उनके दीदार को क्यों है बेक़रारी की हालत, मालूम नहीं। 


सब  जान के  भी  हैं खामोश   उनका इंतजार क्यों!

शायद इस दिल की अब आई है शामत, मालूम नहीं। 


पता नहीं है उस दरिया का इंतजार मैं क्यों करती हूँ,

जिस दरिया से बूँद प्यार  की मिली न अब तक, मालूम नहीं।




जिसकी सफ़र की कोई राह नहीं मंजिल  ही तय है,

उस  सफर से मुझको क्यों है उल्फ़त, मालूम नहीं।

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