Tuesday, April 5, 2022

किस तरह

 देखती हूं तुम्हे इस तरह

चांद को निहारे चकोर जिस तरह

महसूस करती हूं इस तरह

सीने में धड़कन जिस तरह

शामिल हुए तुम जिंदगी में ऐसे

शामिल हो जिंदगी में सांसे जैसे

तड़पती हूं तेरी याद में इस तरह

धूप में तपती हो रेत जिस तरह

भीड़ में तुम हो तन्हाई में तुम हो

सुबह में तुम हो शाम में तुम हो

असर है तेरा इस तरह

शामिल हो जिंदगी में आदत पुरानी जिस तरह

समझ के जो ना समझे

समझाऊं उसे किस तरह?

2 comments:

  1. बहुत ही बेहतरीन रचना है बहुत-बहुत शुभकामनाएं

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  2. समझाऊँ उसे किस तरह…..

    बेहतरीन
    बहुत-बहुत शुभकामनाएं

    ReplyDelete

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