जानती हूं बसता जो तेरी नजर में
वह प्यार हम नहीं।
बेरुखी की तपिश से सुख जाए
वो गुलाब हम नहीं।
सुखा लिया है हमने अब आंसुओं को अपने
बिखर के जो टूट जाए
वो कांच हम नहीं।
निखारा जिस गुलशन को
प्यार के फूलों से
हो गए रुखसत बहारों के हकदार हम नहीं।
छला है खुद ही खुद को प्यार के नाम पर
कैसे कहे खता नही, गुनहगार हम नहीं।
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