Wednesday, June 10, 2026

मुकम्मल दुआ

 

उदासी के अंधेरों में, उम्मीद का इक दिया है ज़िंदगी,

शायद किसी की चाहत का, कोई नया सवेरा है ज़िंदगी।

​अब तक तो बस काट रहे थे सफ़र तन्हाई का,

तुम जो मिले, तो लगा कि जीने का आसरा है ज़िंदगी।

​दिल के सूने आंगन में फिर से आहटें होने लगीं,

तेरी आरज़ू के साए में, अब गुनगुनाती हवा है ज़िंदगी।

​माना कि वक़्त ने दिए हैं कुछ गहरे ज़ख़्म मगर,

तेरी मोहब्बत के मरहम से, अब संभल रही है ज़िंदगी।

​कांच की तरह बिखरे थे जो ख्वाब कभी गुज़रे कल में,

उन्हें समेट कर फिर नए रंग भरने का हौसला है ज़िंदगी।

​अब कोई शिकवा नहीं, न ही कोई उदास ख़ामोशी,

तेरी चाहत की पनाह में, एक मुकम्मल दुआ है ज़िंदगी।

2 comments:

  1. इक मुकम्मल दुआ है जिंदगी! वाह क्या खूब कहा है!!

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काश

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