Saturday, April 25, 2026

खामोशी की जुबां

 ​न दिन ढलेगा, न रात होगी, जो यूँ ही नजरें चुराओगे तुम,

मैं चुप खड़ी हूँ तो क्या ये समझे कि सब यूँ ही भूल जाओगे तुम?

​बड़ी अजीब सी हसरत पाले, बैठे हो शाम के पहलू में,

कि बिन कहे मैं समझूँ सब कुछ, और मुस्कुरा के रह जाओगे तुम।

कहा किसने कि बिन ढले सूरज, सुहानी शाम होती है?

बिना लफ्जों के भी क्या मुकम्मल, कोई दास्तान होती है?

​मैं कर रही हूँ जो सब्र अब तक, उसे मेरी रजा न समझो,

शिकायतें जो दबाईं मैंने, उसे महज अदा न समझो।

मेरी खामोशी पुकारती है, कि तुम अब अपनी जुबां खोलो,

उतर के रूह में मेरी, अब तो हाल-ए-दिल अपना बोलो।

​इशारों से अब न काम चलेगा, न ये आँखें अब पढ़नी हैं,

जो दिल में तुमने छुपा रखी हैं, वो बातें अब तो कहनी हैं।

​अजीब जिद है तुम्हारी जानम, कि सब बिना कहे समझ जाऊँ,

मैं चुप हूँ ताकि तुम कहो कुछ, और मैं तुम में ही खो जाऊँ।

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