Monday, April 6, 2026

तन्हाई

 वादा किया था उसने, पर निभाना भूल गया,

वो अपनी मसरूफियत में आना  भूल गया।

सजी थी महफिलें कल तक जहाँ यादों की,

आज वो शख्स वहां शमा जलाना भूल गया।

भीड़ तो बहुत है इस मतलबी शहर में मगर,

कोई सच्चा रिश्ता यहाँ दिल से बनाना भूल गया।

लिखी थी जो दास्ताँ हमने दिल  की कलम से,

वो वक्त की आंधी में शायद उसे पढ़ना भूल गया।

कहते हैं तन्हाई में ही खुद से मुलाकात होती है,

पर वो आईने में अक्स अपना ही देखना भूल गया।

गिला क्या करें हम मंज़री अपनी किस्मत से यहाँ,

जब कोई अपना ही राह में हाथ थामना भूल गया।

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