तुमने कहा था—"लिखो, मुझे पढ़ना है..."
पर मैं लिखूँ, तो क्या तुम समझ पाओगे मेरे हालात को?
खुद में सिमटे मेरे जज्बात को?
मेरे हर दिन, मेरी हर तन्हा रात को?
कुछ कही, कुछ अनकही बात को?
हर बार टूटकर जुड़ने के मेरे प्रयास को?
राह तकती मेरी आँखों के बेबस इंतज़ार को?
भीगी आँखों से ज़िन्दगी की डोर थामे, मेरे हाथों के कमाल को?
बोलो... पढ़ तो लोगे मेरे लिखे को,
पर क्या बदल भी पाओगे मेरे हालात को?