कुछ दूर हुए, कुछ का छूटा साथ
बिखर गए वो रिश्ते था जिन पर
नाज।
सपने में भ्रम था या भ्रम में सपना
हुए पराए सभी माना जिसे अपना।।
है छलावा या हसीन सपना
लगता है जब कोई अपना
लगती है ठोकर, खुल जाती आंख, नजर नहीं आता कोई
याद रह जाता है बस सपना।।
उड़ जाती है नीद याद आता है हर वो चेहरा, थे कभी जो साथ
माना था जिन्हें दिल ने अपना।।
खोकर खुद को कहना किसी को अपना, जैसे होश हवास में खुद को छलना।।
पाओ खुद को बनाओ अपना
होंगे पूरे हर ख्वाब, नही छूटेगा कोई साथ, ना टूटेगा कोई सपना।।