संवार रही थी जुल्फें
आइने ने पूछा मुझसे
है तू कली पर
मुरझाई है क्यों मन से?
क्या दूं जवाब पूछा मन ही मन में
मिलाना जब कोई जवाब खुद से
दिल ने कहा नाराज़ हूं शायद
किसी और से नहीं खुद से
मालूम नहीं शिकायत है क्या खुद से
नाराज हूं शायद मन की उड़ान से
या उड़ान के अंजाम से
नाराज हूं शायद किसी खुशी किसी गम से
नाराज हूं प्यार से
या खोने के एहसास से
नाराज हूं भरोसे पे
या टूट जाने से
नाराज़ हूं खोने से
या क्यों पाया इस बात से
जो ना मिल पाया इस मलाल से
सवाल है कई
पर ना आया कोई हल निकल के
नाराज़ हुए शायद खुद से।
आइने ने पूछा मुझसे
है तू कली पर
मुरझाई है क्यों मन से?
क्या दूं जवाब पूछा मन ही मन में
मिलाना जब कोई जवाब खुद से
दिल ने कहा नाराज़ हूं शायद
किसी और से नहीं खुद से
मालूम नहीं शिकायत है क्या खुद से
नाराज हूं शायद मन की उड़ान से
या उड़ान के अंजाम से
नाराज हूं शायद किसी खुशी किसी गम से
नाराज हूं प्यार से
या खोने के एहसास से
नाराज हूं भरोसे पे
या टूट जाने से
नाराज़ हूं खोने से
या क्यों पाया इस बात से
जो ना मिल पाया इस मलाल से
सवाल है कई
पर ना आया कोई हल निकल के
नाराज़ हुए शायद खुद से।
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