जाना चाहूं जो दूर और पास आ जाती हूं
बंधन नही कोई मगर बिन डोर खींची जाती हूं
छुपाना था हाल ए दिल मगर
नजरे हर राज बया कर जाती है
हो गई हूं दिल से मजबूर इस इस कदर
करना चांहू कुछ मगर कुछ कर जाती हूं
समझाती हूं खुद को मगर
आए जाता है जब नाम तेरा
नासमझ बन जाती हूं
कर लेंगे खुद को हर यादो से दूर
सोच फिर से तेरी यादों में खो जाती हूं।
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