Monday, March 30, 2026

अब जो हो सो हो जाए

 लगी है तुमसे ऐसी लगन, अब जो हो सो हो जाए

बदला है हमने अपना चलन, अब जो हो सो हो जाए


डरे थे हम कि रुसवा न कर दे ये जमाना हमें

छुपाकर रखा था ये तड़पन, अब जो हो सो हो जाए


हटा दिया है रुख से पर्दा और वहम की चादर भी

रहा न डर, न कोई अड़चन, अब जो हो सो हो जाए


बड़ी मुश्किल से लब खोले हैं, बातें अब बनाने दो

रुकी थी शर्म से ये धड़कन, अब जो हो सो हो जाए


कहो 'बेशर्म' या 'दीवाना', जो भी दिल में आए अब

हुए हैं हम तो तेरे अर्पण, अब जो हो सो हो जाए


जमाने से छुपे क्यों हम? छुपाना क्या? डरना क्या?

मिले जो तेरी बाहों के सावन, अब जो हो सो हो जाए

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