Tuesday, July 28, 2026

जब्त

 

आसमाँ पर जो ये बादल छा गए हैं,

ज़िंदगी की गहराई समझा गए हैं।

​कितने तूफ़ानों को सीने में दबाकर,

धूप में भी साया बनकर आ गए हैं।

​भर गए जब दर्द से, तो बरस ही पड़े,

ज़ब्त की हद क्या होती है, दिखा गए हैं।

​न कोई घर है इनका, न कोई ठिकाना,

फिर भी हर तिश्नगी को बुझा गए हैं।

​ख़ाली होकर ही पाई है इन्होंने राहत,

बोझ हल्का कैसे करें, ये सिखा गए हैं।

​फ़ना होकर भी जो ज़मीन को संवार दें,

जीने का असल मक़सद वही पा गए हैं।

1 comment:

  1. जिंदगी के बारीक प्रश्नों का हल यही है।

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