आसमाँ पर जो ये बादल छा गए हैं,
ज़िंदगी की गहराई समझा गए हैं।
कितने तूफ़ानों को सीने में दबाकर,
धूप में भी साया बनकर आ गए हैं।
भर गए जब दर्द से, तो बरस ही पड़े,
ज़ब्त की हद क्या होती है, दिखा गए हैं।
न कोई घर है इनका, न कोई ठिकाना,
फिर भी हर तिश्नगी को बुझा गए हैं।
ख़ाली होकर ही पाई है इन्होंने राहत,
बोझ हल्का कैसे करें, ये सिखा गए हैं।
फ़ना होकर भी जो ज़मीन को संवार दें,
जीने का असल मक़सद वही पा गए हैं।
जिंदगी के बारीक प्रश्नों का हल यही है।
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