टूट कर जो संवर गई
वह चट्टान हूं
तप कर बना जो
वह सोने का हार हूं
टूट कर डाली से भी
खिल गया जो
वह गुलाब हूं
हर चोट से मजबूत बने जो
वह फौलाद हूं
हजारों मील तय करके
मिले जो सागर में
वह नदी की धार हूं
दर्द में डूब कर
लिखे जो शायरी
वो कलम की धार हूं
हैरान ना हो ए जिंदगी
तेरे हर दर्द को
हथियार बना कर
तुझसे हर जंग फतह
को तैयार हूं
वह चट्टान हूं
तप कर बना जो
वह सोने का हार हूं
टूट कर डाली से भी
खिल गया जो
वह गुलाब हूं
हर चोट से मजबूत बने जो
वह फौलाद हूं
हजारों मील तय करके
मिले जो सागर में
वह नदी की धार हूं
दर्द में डूब कर
लिखे जो शायरी
वो कलम की धार हूं
हैरान ना हो ए जिंदगी
तेरे हर दर्द को
हथियार बना कर
तुझसे हर जंग फतह
को तैयार हूं