Sunday, December 15, 2019

क्यूं

बात बराबरी की तुम्हे खटक क्यों जाती है?
पाया जिनसे जीने का अधिकार
नज़रें उन्हीं पर मचल क्यों जाती है?
हाथ पकड़ कर चलना सीखा जिनसे
नज़रें उन्हें ही क्यों डराती है?
नौ महीने रहकर उनमें
उनकी वेदना समझ क्यों नहीं आती है?
इंसानियत छोड़ना क्या यही
मर्दानगी कहलाती है?
पुरुषत्व उन्मत हुआ
जब महिष रूप में
नारी ने संहार किया दुर्गा रूप में
ये बात कैसे भूल जाती है?
मांगकर शक्ति से शक्ति
बनते हो बलवान
शरम क्यों  नहीं आती है?
किस ज्ञान का है अभिमान?
हारकर  विद्योतमा से ही
बना कोई कालिदास
लड़की को संस्कार सिखाते हो
लड़के को जैंटलमैन क्यों नहीं बनाते हो?
सौम्यता का रूप है जो
उसे काली क्यों बनाते हो?
नारी से ही है जीवन में खुशियां
सीधी सी बात समझ क्यों नहीं पाते हो?









Tuesday, December 10, 2019

अक्स

ना परी ना हूर जैसी
ना  शायर की गजल जैसी
ना सूरज का तेज ना चांदनी जैसी
ना सरगम के सुर जैसी
थोड़ी अलबेली थोड़ी पहेली
थोड़ी सी अलग खुद की सहेली
मुश्किलों को पार करती अकेली
क्या कहूं किसके जैसी
मैं बस मेरी जैसी।


Monday, December 9, 2019

बात

सोच समझ के तोलो
फिर मुंह से बोलो
क्योंकि बाते है
बेहद खास
बाते ही रिश्तों में
लाती है मिठास
बातो से आती खटास
बात बिगाड़े काम
बिगड़े काम बनाए बात
बाते लाती है पास
बात ही कराती
दूरी का अहसास
दिल लुभाती है बात
दिल दुखाती है बात
अच्छी बात प्यारी बात
कई तरह की होती बात
याद रखना हमेशा ये बात
जब भी बोलो कोई बात
हो मिठास मगर
बोलो सच्ची बात।

अकड़

थे साथ हम मगर
तुम थे हम नहीं
सुना है आशियाने तेरे कई
ठिकाना मेरा कोई नहीं
आम है किस्से तेरी रहनुमाई के
हक मेरा कोई नहीं
है गुरुर जो खुद पर अगर
याद ये भी रखना मगर
जो ना हो झुकने का हुनर
आंधियों में बिखर गए जो
ठिकाना उनका कोई नहीं।

Wednesday, November 27, 2019

हौसला

हौसले ने उड़ान भर ली है
उम्मीदों की उड़ान जारी है
फतह कर लिया है जहां हमने
अब आसमां छूने की बारी है
चट्टानों से डरकर
लहरों ने हार कब मानी है
छट गये दुश्वारियों के बादल
नए तेज से चमकने को
हौसले ने कर ली तैयारी है।

Monday, November 18, 2019

अस्तित्व

चाय में डूबे बिस्किट को देखकर
ये ख्याल  आया
डूब जाओ गर  किसी में
वजूद किस कदर बिखर जाता है
डूबने का घर शौक है तुझे
तो खुद में डूब जाओ
गर खुदा ना मिले
शायद खुद को ढूंढ पाओ
नदिया भी डूबकर सागर में
वजूद खो देती है
गर हुए खुद से जुदा
दुनिया भी जीने कहां देती है
जलने का है गर  शौक तुझे
 तो सूरज बन जाओ
रोशन कर खुद को
जहां को चमकाओ।

Wednesday, November 13, 2019

बचपन

सुबह की हड़बड़ी
रात का सन्नाटा
याद बहुत आता है
बचपन सुहाना
दिन के राजा थे
रातों के शहंशाह
हर खुशी पर
हक था हमारा
है जिंदगी में अब
सब कुछ मगर
ना रहा खुद पर
कोई हक हमारा
याद बहुत आता है
बचपन सुहाना।

काश

  ​नन्ही आँखों में थी सपनों की ऊँची उड़ान - प्यारी थी  ज़िंदगी - लबों पर मुस्कान ​थी हर कदम पर मुश्किले पर दिल को था एहसास, बदलेगी  दु...