मुलाकातों को टालने के वो सौ बहाने बनाता है,
नाराज़गी है या हया, बस यही छुपाता है।
कभी कहता है मशरूफियत बहुत है ज़माने की,
कभी थकावट का चेहरा हमें दिखाता है।
वो हाथ छुड़ाकर जो जाने की ज़िद करता है,
जाने क्यों फिर मुड़कर नज़र मिलाता है।
पूछा जो हमने कि याद करते हो हमें?
मुस्कुरा कर वो फिर बात को घुमाता है।
आने का वादा कर मुकर जाता है।
करो शिकायत तो हालात बताता है।
बहाना ही सही, पर ज़िक्र तो है मेरा उसकी ज़ुबाँ पर,
इसी तसल्ली में ये दिल सुकून पाता है।