ग़म की धूप में भी जिसने मुस्कुराना सीख लिया,
ज़िम्मेदारियों के बोझ में भी कदम बढ़ाना सीख लिया।
पिता का साया उठा, फिर माँ पर भी आई आँच,
हर दर्द को सीने में उसने छुपाना सीख लिया।
बचपन की गरीबी थी, फिर खुशियों पर ग्रहण लगा,
टूटे सपनों से भी नया आशियाना बनाना सीख लिया।
खो गई बेफ़िक्री, छूट गया वो फोटोग्राफी का शगल,
उसने हर मोड़ पर हालात से टकराना सीख लिया।
छीन ली ज़माने ने उसकी मासूमियत, वो हँसी,
पर उम्मीद के धागे से ख़ुद को पिरोना सीख लिया।
नाज़ुक हाथों में कलम है, दिल में है बुलंद हौसला,
उसने हर स्याही से अपना मुक़द्दर सजाना सीख लिया।
यकीन है उसे, बदलेगी ये फ़िज़ा, बीतेगी ये रात,
अंधेरों की राहों में उसने चिराग़ जलाना सीख लिया।