Friday, July 31, 2026

एक सवाल

 

तुमने कहा था—"लिखो, मुझे पढ़ना है..."

पर मैं लिखूँ, तो क्या तुम समझ पाओगे मेरे हालात को?

खुद में सिमटे  मेरे जज्बात को?

​मेरे हर दिन, मेरी हर तन्हा रात को?

कुछ कही, कुछ अनकही बात को?

​हर बार टूटकर जुड़ने के मेरे प्रयास को?

राह तकती मेरी आँखों के बेबस इंतज़ार को?

भीगी आँखों से ज़िन्दगी की डोर थामे, मेरे हाथों के कमाल को?

​बोलो... पढ़ तो लोगे मेरे लिखे को,

पर क्या बदल भी पाओगे मेरे हालात को?

Tuesday, July 28, 2026

जब्त

 

आसमाँ पर जो ये बादल छा गए हैं,

ज़िंदगी की गहराई समझा गए हैं।

​कितने तूफ़ानों को सीने में दबाकर,

धूप में भी साया बनकर आ गए हैं।

​भर गए जब दर्द से, तो बरस ही पड़े,

ज़ब्त की हद क्या होती है, दिखा गए हैं।

​न कोई घर है इनका, न कोई ठिकाना,

फिर भी हर तिश्नगी को बुझा गए हैं।

​ख़ाली होकर ही पाई है इन्होंने राहत,

बोझ हल्का कैसे करें, ये सिखा गए हैं।

​फ़ना होकर भी जो ज़मीन को संवार दें,

जीने का असल मक़सद वही पा गए हैं।

Wednesday, June 10, 2026

मुकम्मल दुआ

 

उदासी के अंधेरों में, उम्मीद का इक दिया है ज़िंदगी,

शायद किसी की चाहत का, कोई नया सवेरा है ज़िंदगी।

​अब तक तो बस काट रहे थे सफ़र तन्हाई का,

तुम जो मिले, तो लगा कि जीने का आसरा है ज़िंदगी।

​दिल के सूने आंगन में फिर से आहटें होने लगीं,

तेरी आरज़ू के साए में, अब गुनगुनाती हवा है ज़िंदगी।

​माना कि वक़्त ने दिए हैं कुछ गहरे ज़ख़्म मगर,

तेरी मोहब्बत के मरहम से, अब संभल रही है ज़िंदगी।

​कांच की तरह बिखरे थे जो ख्वाब कभी गुज़रे कल में,

उन्हें समेट कर फिर नए रंग भरने का हौसला है ज़िंदगी।

​अब कोई शिकवा नहीं, न ही कोई उदास ख़ामोशी,

तेरी चाहत की पनाह में, एक मुकम्मल दुआ है ज़िंदगी।

Sunday, June 7, 2026

पनाह

 

​धड़कनों की सदा में, एक अनकही बात हो,

जिस्म की चाह न हो, बस रूह का साथ हो।

​लग कर तेरे गले सिमट जाए ये सारी कायनात,

लम्हा सदियों में ढले ऐसा साथ हो ।

​ न हो जहां शिकवे, न कोई ख़ौफ़  की बात 

 बेइंतहा यक़ीन और पाक  जज़्बात हो।

​एक लम्हे में बुझ जाए बरसों की प्यास,

जब दिल से दिल  की  मुलाक़ात हो।

​ 'मन' को तलब रहे बस तेरी पनाह की,

इस पाक मोहब्बत की न कभी हार हो।

Saturday, May 2, 2026

खामोश बेरुखी

 दिल से तुमको दिल्लगी है, मुझे है दिल का गुमान

  चाहे तुम चाहो न चाहो फिर भी लेंगे तेरा नाम।

   न जाने ये कैसी दीवानगी है या मुहब्बत का जुनून

    तुम न समझ सके तो है ये तेरी समझ का कुसूर।।


      मुझे है तुम्हारी ही चाहत, दिल है तुम्हारे लिए बेकरार

       तुम न आओ फिर भी मगर हम करेंगे इंतजार।

        तन्हाइयों में जो घुट जाए जो दम

         फिर न आवाज देना लौट के न आयेंगे हम।।

    

Monday, April 27, 2026

वक्त का सवाल

 

शाम की दहलीज़ पर ठहरा है एक सवाल,

वक़्त की गर्द में गुम है मेरा ही ख़याल।

अधूरी हसरतों का बोझ उठाए फिरती  हूँ,

सुकून की तलाश में गुज़रा है हर साल।

​मझधार में सिमटी हैं कई अनकही बातें,

पछतावे की धूप है या उम्मीदों की रातें।

बिखरे हुए अक्स को फिर से समेट लूँ,

पर इस टूटे हुए आईने का क़ातिल है कौन।

​थक कर ठहरी है लहर, किनारे की तलाश में,

एक उम्र गुज़ारी है बस, इसी आस में।

मंज़िल की ज़ुस्तज़ू में सफ़र तो कट गया,

अब ये न पूछना कि मेरा हासिल है कौन।

Saturday, April 25, 2026

खामोशी की जुबां

 ​न दिन ढलेगा, न रात होगी, जो यूँ ही नजरें चुराओगे तुम,

मैं चुप खड़ी हूँ तो क्या ये समझे कि सब यूँ ही भूल जाओगे तुम?

​बड़ी अजीब सी हसरत पाले, बैठे हो शाम के पहलू में,

कि बिन कहे मैं समझूँ सब कुछ, और मुस्कुरा के रह जाओगे तुम।

कहा किसने कि बिन ढले सूरज, सुहानी शाम होती है?

बिना लफ्जों के भी क्या मुकम्मल, कोई दास्तान होती है?

​मैं कर रही हूँ जो सब्र अब तक, उसे मेरी रजा न समझो,

शिकायतें जो दबाईं मैंने, उसे महज अदा न समझो।

मेरी खामोशी पुकारती है, कि तुम अब अपनी जुबां खोलो,

उतर के रूह में मेरी, अब तो हाल-ए-दिल अपना बोलो।

​इशारों से अब न काम चलेगा, न ये आँखें अब पढ़नी हैं,

जो दिल में तुमने छुपा रखी हैं, वो बातें अब तो कहनी हैं।

​अजीब जिद है तुम्हारी जानम, कि सब बिना कहे समझ जाऊँ,

मैं चुप हूँ ताकि तुम कहो कुछ, और मैं तुम में ही खो जाऊँ।

काश

  ​नन्ही आँखों में थी सपनों की ऊँची उड़ान - प्यारी थी  ज़िंदगी - लबों पर मुस्कान ​थी हर कदम पर मुश्किले पर दिल को था एहसास, बदलेगी  दु...