तेरे इंतजार में बातें खुद से तमाम कर लेती हूं
कभी लिखती हूं कभी गुनगुनाती हूं
सवार कर खुद को दर्पण निहार लेती हूं
हर दिन अगले दिन का इंतजार कर
कम हो रही है दूरियां कितनी हिसाब कर लेती हूं
हर लम्हा हो तेरा खुशगवार
हर इंतजाम कर लेती हूं
मिलन की हर घड़ी संजो मन में रख लेती हूं
जाकर आओगे फिर इस इंतजार में
मन को तेरी यादों से भर लेती हूं।
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