ना है वो अपना ना पराया
रिश्ते का कोई नाम नहीं
बस रिश्ता है अनजना
झुकी नजरों से मुझे देखना
सामने से नजर बचाना
ना मिले तो ढूंढे बहाना।
मिल कर भी हाल ए दिल छुपाना
याद है उसका ज़ख्म पर मरहम लगाना।
चांद के बहाने दरिया किनारे मुझे निहार जाना
सर्दियों की उन रातों में बस यूं ही कुछ दूर साथ जाना।
हक़ीक़त हैं नहीं कोई अफसाना
बस रिश्ते का नाम है अनजाना।
है जो अपनो से भी खास
सपनों से भी प्यारा।।
आप का लेखन भावप्रवण और अपना सा लगता है।
ReplyDeleteThank you so much
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