तहजीब में हम अदब से सर झुकाते हैं ।
मगरुर मगर अकड़ के निकल जाते हैं।।
इतराते है एक फूल पर महक दुनिया को बताते हैं ।
खुशबू से महका चमन हम यूँही छोड़ आते हैं।।
मचल जाते है बारिश की एक बूंद से दुनिया को दिखाते हैं ।
बूंदों की बारिशों में हम नहा के निकल जाते हैं।।
कांच के टुकड़ों को हीरो को ढेर बताते है।
न जाने कितनी दौलत हम छोड़ आते हैं।।
पंख है नए नए अपनी उड़ान दिखाते है।
अपनी परवाजो से हम दुनियों नाप के आते हैं।।
सीखे है दो चार शब्द अभी खुद को जानकार बताते है।
सीख के जीवन का हर सबक हम तहजीब से सर झुकाते हैं।।